माँ-कलश एक ममता की

कड़कती धूप मे चाहे छांव हो न हो

कांटो बिछी मंजिल पर चाहे राह हो न हो

हो चाहे घना अंधेरा,जीने की चाहे कोई आश हो न हो

जिंदगी के सफ़र मे चाहे कोई साथ हो न हो…

वो देगी अपनी ममता की छांव तुझे

वो देगी अपने अश्रुमय पुष्प की राह तुझे

वो देगी  अंधेरे मे  प्रकाशपुंज हाथ का सहारा तुझे

वो देगी अंतहीन सफ़र तक आशीर्वाद तुझे…

दुर्दांत कीचड़ मे कमल बनाकर खिलाएगी तुझे

खुद मरकर अमर बनाएगी तुझे…

हर दिन है प्यार के काबिल है वो

तेरी खातिर कोई नही,पर सिर्फ तेरे ख़ातिर है वो

ऐसी मेरी प्यारी माँ है वो

सिर्फ यही एक दुलारी मेरी माँ है वो….

Life gives always new momentum new adventure new experinces new sorrow new happiness…i am always welcome to it is…and you??

गुलशन की फ़क़त फूलो से नहीं

कांटो से भी जीनत होती है

जीने के लिए इस दुनिया मे

ग़म की भी जरूरत होती है…

टैंकर

अम्मा…अम्मा..

जल्दी करो न.. कल मैडम फिर से मुझे बाहर खड़ी की थी मुझे रोज पनिशमेंट मिलती है…

“रुक जा लल्ला, तेरे पप्पा बस आते ही होंगे”

“अम्मा..मैं आज नहाऊंगा, तीन दिन हो गए ,तु रोज हाथ मुह धुलकर स्कूल भेज देती है”

“ऐ पटरी,क्यू अम्मा को तंग कर रहा है तु आज भी ऐसे ही स्कूल जायेगा हीहीही”

“अम्मा…देखो न भइया फिर से पटरी बोल रहे है”

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बड़े बड़े महानगरो के बीच दबे हुए ये एक झोपड़पट्टी की कहानी है जंहा जिंदगी की मुश्किलो से लड़ने के बजाय यहां के लोग रोजमर्रा की मुश्किलो से झूझते है..

झोपड़पट्टी की एक गली..घर मे पांच सदस्य

कैलाशनाथ और उसकी पत्नी मनित देवी, दो पुत्र एक पुत्री, सबसे छोटा पुत्र प्रेमन उससे एक बड़ी बहन प्रेमलता और सबसे बड़ा भाई प्रेम…

सबसे छोटा और सबसे नटखट होने के कारण उसके प्रति सबका वात्सल्य ज्यादा था ऐसी वजह से प्रेम उसे पटरी कहकर चिढ़ाता था

कहानी किसी एक घर की नही है अपितु ये हर उस घर की है ये उस समाज की है जंहा हम चंकाचौध की पीछे डूबे अंधियारे की ओर देखने का प्रयास भी नही करते…

इसके दोषी हम है या हमारी सरकार…आप खुद सोचियेगा…

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“प्रेम भइया कल का अम्मा का चिमटा लगता है भूल गए है”

“चल पटरी,आज स्कूल वाले राश्ते मे मैं तुझे छोड़कर चला आऊंगा”

“अम्मा…..

“ऐ प्रेम ,तु फिर आज मार खायेगा काहे परेसान कर रहा है लल्ला को, आ जा लालू तुझे मैं खाना खिला दु पप्पा आएंगे फिर तुझे तैयार कर दूंगी”

“प्रेमा…जरा देख कर आ..आज टैंकर वाला आने मे देर कर दिया है क्या? जो तेरे पप्पा इतनी देरी कर रहे है??

रोज रोज देरी करते है कितनी बार कहा है एक छोटा मोटा ही मकान ले लो मोहल्ले मे,रोज रोज के किचकिच से मुक्ति मिलेगी पर मेरी सुनता कौन है उस थेलम ठेले मे मज़ा जो आता है, यहां पीने का भी पानी मुवास्सार नहीं है चार चार दिन पर बच्चे नहाते है जा देख कर आ जल्दी?

“पर अम्मा सरकार तो पानी सस्ता कर दि है न”

“बेटा ये सब सुविधाये हम जैसे गरीबो के लिए नही है तु नही समझेगा”

(प्रेमलता दौड़ते हुए आती है और हाफ़ते हुए बोलती है)

अम्मा..भइया…अम्मा जल्दी चलो..

“क्या हुआ रे,तु इतना हांफ क्यू रही है”

“अम्मा तु जल्दी चल..

(और घर के सभी लोग प्रेमलता के पीछे पीछे भागे ज रहे है..)

(टैंकर के पास का नजारा काफी भयावहः था..टैंकर पलटा हुआ था और उसके नीचे काफी लोग दबे हुए थे पर मनित देवि की आँखे तो सिर्फ अपने पति को ढूंढने मे लगी हुई थी उन लोगो के बीच उसे एक हाथ दिखाए देता है जिसपर कुछ दिन पहले ही शादी के सालगिरह पर दरगाह वाले बाबा के पास से धागा बांधा हुआ था और मनित देवी ये देखकर बेहोश हो जाता है छोटा लल्ला कुछ समझ नही पा रहा ये हो क्या रहा है और उसका बड़ा बेटा उस टैंकर को उठाने मे सबकी मदत कर रहा है…

शायद पानी लेने की होड़ मे कुछ लोग टैंकर पर चढ़ गए थे और पानी की छीना छपटी मे पता नही चला कब टैंकर का पहिया धस गया और टैंकर पलट गया..
कुछ देर बाद मनित देवी की मूर्च्छा दूर होती है और शायद उसे अपने पति के जाने से ज्यादा ग़म इस बात का है की कल से उसके बड़े बेटे को टैंकर से पानी लाना पड़ेगा…

खैर सरकार ने इस घटना पर संवेदना प्रकट की है और नगर निगम वालो के इस लापरवाही की कड़ी आलोचना भी की है…..

नदी-एक विचाराधीन प्रश्न

क्या देख रहे हो??

अरे मैं वही हूँ आप सबकी चहेती.. 

मैं कभी देवी की तरह पूजि जाती थी

देवराज इन्द्र ने वृत्त नामक दानव से मेरी रछा भी किये थी

ऋग्वेद मे मुझे सर्वोपरि माना गया है ओर मुझसे ही सृस्टि का आरम्भ हुआ ऐसा आपके वेदों मे कहा गया है

सिर्फ हिन्दू धर्म मे ही नही , अपितु विभिन्न धर्मो मे मुझे सबसे उत्तम माना गया है

फिर आज ऐसा क्यों है की मुझसे इतनी नफरत हो गई आप सबको…

मैंने तो बस दिया ही है कभी कुछ लिया नही…मैंने तो कभी नही कहा मेरी पूजा करो बस जैसे स्वयं को स्वच्छ रखते हो उतना ही तो करना था…

आज मेरी इस हालत के जिम्मेदार सिर्फ आप लोग है…

मुझमे अब वो सरलता चपलता मिठास शुद्धता औषधि नही रह गई

मैं सूखती जा रही हूँ

एक दिन इसी संदर्भ मे मेरी बात एक आदमी से हुई..

मेरे सूखे हुए टिले पर वो आदमी शौच कर रहा था और जब मैंने उससे कहा…”ऐ आदमी..तू ये क्या कर रहा है,कभी मुझे फूल मालाओं से सुसज्जित करता है और कभी स्वयं इसमे मलमूत्र का त्याग करता है, क्या तुझे ज्ञात नही अब मुझे मानवाधिकार मिल चुका है…

उस आदमी ने हँसते हुए प्रत्युउतर दिया…”हम इंसानो की यही फितरत है जिस थाली मे खाते है उसी मे छिद्र करते है,अरे आप समझी नही,,इतने वर्षो से आपको देवी की संज्ञा दी गयी थी अब आपका demotion हो चुका है जिसे आप pramotion समझ कर खुश हो रही है..देवी समझ कर तो आपको बचाने की चेष्टा नही की गए अब इंसान समझकर क्या खाक बचाया जायेगा… हजारो case pending मे पड़े हुए है उनकी तो कोई सुनवाई करता नही फिर किसको इतनी फुर्सत है की आप पर ध्यान देगा..”

मैं केवल उसकी बातो को सुन रही थी क्योंकि शायद कही न कही उसकी बातो मे भी सच्चाई थी …

उसने आगे कहा-हम इंसान है देवी जी..बिना लातो के कोई बात मानते तो आज आप की हालत इतनी दयनीय नही होती…

अब मुझे उसकी बातो पर हंसी आई क्योंकि सभी जानते है बिना मेरे उनका कल सम्भव नही…भूतकाल को देखकर वर्तमान मे सबक नही लेंगे तो इनका भविष्य कितना भयावहः होगा इसकी कल्पना करना भी मुश्किल है…

प्रतिदिन देखती हूँ रोज कोई न कोई स्कीम निकाली जाती है बातें की जाती है पैसे खर्च किये जाते है पर न तो कारखानो का पानी का मुझमे मिलना बनद हुआ न तो मलमुत्रो का मिलना…अनगिनत कारण है और उन सभी कारणों के कारण सिर्फ आप लोग है..

कुछ है जो मुझे बचाना चाहते है पर अकेला चना भाड़ नही फोड़ता…आप सभी को मिलकर मुझे बचाना होगा..बस एक बार मेरी तरफ अपना हाथ बढ़ाइए मैं वचन देती हूँ आप का एक कदम मेरे सौ कदम…

मुझे कोई अधिकार नही चाहिए मुझे बस आप सबका साथ चाहिए…

स्वच्छ जल स्वच्छ विचार

एकल युग एकल अधिकार

आज हो या कल,सुंदर संसार

अनन्त हाथ अनंत विचार

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पतझड़ सी यादे

शाख टहनियों की उदासी फिजाओ मे है

सुनसान धूप की चौराहे पर बेकरार पथिक है

मनिक एक आस दिल पाने को है

कोई कहे सावन आने को है

सूखे आंखो से गिरते अंगारो मे,

एक पुरानी पतझड़ यादे बुलाती है:'(

टूटे पगडंडियों सी छिपी तेरी मुस्कान

बुलाती है मेरे आँगन की वो तुलसी

झुर्रियों मे सिकन नही तेरे उम्मीद मे

की शिकायते ठंडी हो रही है

एक पुरानी पतझड़ यादे बुलाती है…

इक कहानी

जिंदगी की भी सिर्फ दो है कहानी

एक तुम और इन आंखो का पानी…

सिलसिला यूँ चलता रहा ताउम्र

दिल के दरारो को भरते रहे ताउम्र

इंतजार ए मोहब्बत को समझ बैठे आप मेहरबानी..

और करते है नासमझ दिल के साथ आप मनमानी…

यही है हमारी जिंदगी की कहानी..

सिर्फ तुम और इन आंसुओ का पानी…

कीचड़ मे कमल खिलाने चले थे हम

एक बेवफा से वफ़ा निभाने चले थे हम

देख न पाये फूलो पर बैठे भवरो को

मोहब्बत के पीछे छुपी आपकी खतावो,जफावो को..

कर बैठे हर बार भरोसे की नादानी..

जिंदगी की बस यही छोटी सी है कहानी..

इक तुम और इन आंखो का पानी…